अष्टावक्र गीता भारतीय दर्शन का एक अद्वितीय ग्रंथ है, जहाँ ज्ञान किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि सीधा बोध बनकर प्रकट होता है। यह ग्रंथ ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ ऐसा संवाद है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है।
यह पुस्तक आत्मा, मन, बंधन और मुक्ति जैसे गूढ़ विषयों को सरल हिंदी शब्दों में प्रस्तुत करती है, ताकि आज का पाठक भी इस प्राचीन ज्ञान को सहजता से समझ सके।
ऋषि अष्टावक्र की वाणी तर्क से नहीं, अनुभव से बोलती है। यहाँ न कोई कर्मकांड है, न कोई जटिल साधना—केवल स्वयं को पहचानने का साहस है। राजा जनक जैसे गृहस्थ के माध्यम से यह ग्रंथ दिखाता है कि आत्मबोध किसी एकांत या त्याग पर निर्भर नहीं, बल्कि जागरूकता पर आधारित है।
यह संवाद सिखाता है कि बंधन बाहर नहीं, हमारे विचारों में हैं, और मुक्ति कहीं दूर नहीं, इसी क्षण में है। यह ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते पाठक धीरे-धीरे श्रोता नहीं, सहभागी बन जाता है। अंततः यह पुस्तक प्रश्नों के उत्तर नहीं देती, बल्कि प्रश्नों को ही शांत कर देती है।
यह केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि स्वयं को देखने का दर्पण है।
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क्रमांक |
शीर्षक |
पृष्ठ संख्या |
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परिचय |
1-3 |
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अध्याय 1 |
अविद्या योग यानी अज्ञान का योग |
5-8 |
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अध्याय 2 |
सत् ज्ञान योग |
9-11 |
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अध्याय 3 |
आत्मा दर्शन |
12-17 |
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अध्याय 4 |
बन्ध-मोक्ष का विवेक |
18-24 |
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अध्याय 5 |
मुक्तात्मा का मार्ग |
25-28 |
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अध्याय 6 |
आत्मा का अनुभव और साक्षीभाव |
29-33 |
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अध्याय 7 |
सत्य का बोध और आत्मा का स्वरूप |
34-40 |
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अध्याय 8 |
ब्रह्मभाव अवस्था |
41-43 |
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अध्याय 9 |
वैराग्य योग |
44-47 |
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अध्याय 10 |
ज्ञान योग |
48-50 |
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अध्याय 11 |
समाधि योग |
51-54 |
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अध्याय 12 |
विमुक्ति योग |
55-58 |
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अध्याय 13 |
यथासुखम् |
59-61 |
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अध्याय 14 |
इंद्रियविजय योग |
62-64 |
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अध्याय 15 |
तत्त्वम् "तत्त्वम् असि" – तू वही है। |
65-67 |
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अध्याय 16 |
स्वास्थ्य |
68-70 |
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अध्याय 17 |
कैवल्य |
71-73 |
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अध्याय 18 |
जीवन्मुक्ति |
74-76 |
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अध्याय 19 |
स्वमहिमा |
77-80 |
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अध्याय 20 |
अकिंचनभाव |
81-84 |
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अध्याय 21 |
अष्टावक्र गीता समापन भाग: अंतिम बोध की ओर |
85-87 |
Hindi and Religious Book